TET अनिवार्यता पुनर्विचार: TET अनिवार्यता पर संसद में गरमागरम बहस — शिक्षकों की मांग और राजनीतिक हलचल
नई दिल्ली — संसद के राज्यसभा और लोकसभा सत्रों में शिक्षकों के बीच विवादित टीईटी (Teacher Eligibility Test) अनिवार्यता का मुद्दा गूंज रहा है, जिससे संसद में राजनीतिक बहस व संवाद का माहौल बन गया है।
क्या है विवादित मुद्दा?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया कि प्राथमिक से आठवीं तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षक जो सेवा में हैं या प्रमोशन चाहते हैं, उन्हें TET पास करना होगा ताकि वे नियोक्ता प्रक्रिया और नियमों के अनुरूप बने रहें। इससे हजारों सेवारत शिक्षकों की नौकरी और प्रमोशन पर अनिश्चितता बढ़ गई है, खासतौर से उन शिक्षकों के लिए जो TET लागू होने से पहले नियुक्त हुए थे।

संसद में उठी टीईटी को हटाने की मांग
राज्यसभा में मंगलवार को शून्यकाल के दौरान कई सांसदों ने सरकार से मांग की कि टीईटी अनिवार्यता को हटाया जाए या इस पर राहत देने के लिए संशोधन लाया जाए। भाजपा सांसद सीमा द्विवेदी ने इस विषय को उठाते हुए कहा कि दो लाख से अधिक शिक्षक इस फैसले के बाद तनाव का सामना कर रहे हैं और उन्हें राहत दी जानी चाहिए।
शिक्षक संगठन भी आवाज बुलंद
संसद के बहस के पहले भी कई शिक्षक संगठन TET अनिवार्यता के खिलाफ प्रदर्शन कर चुके हैं। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षक संगठनों ने जंतर-मंतर पर मैनिफेस्टो और विरोध प्रदर्शन किए, जिसमें TET को हटाने और प्रमोशन की सहज प्रक्रिया की मांग प्रमुख रही।
राजनीतिक हलचल
TET मुद्दा अब सिर्फ़ न्यायालय और शिक्षक संगठनों तक सीमित नहीं रहा; बल्कि संसद में राजनीतिक दलों के बीच बहस का विषय भी बन गया है। विपक्ष ने सरकार से कहा कि वह TET के बारे में संशोधन और राहत पैकेज लाए, ताकि सेवारत शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित किया जा सके।
आगे क्या हो सकता है?
इस मुद्दे पर संसद में और अधिक चर्चा जारी रहने की उम्मीद है। टीईटी अनिवार्यता को लेकर:
- सरकार पर दबाव बढ़ रहा है कि वे संसदीय standing committee में विचार करें,
- या RTE Act / NCTE Act में संशोधन करें ताकि पुरानी नियुक्ति वाले शिक्षकों को राहत दी जा सके।
यह मामला शिक्षा नीति, अदालत के फैसले और सांसदों द्वारा उठाए गए सवालों की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन गया है, जो सम्पूर्ण देश के लाखों शिक्षकों और शिक्षा व्यवस्था पर प्रभाव डाल सकता है।










